टीईटी प्रारंभिक शिक्षक संघ (TPSS) बिहार द्वारा हाई कोर्ट में एक केस दर्ज किया है।जिसमें सक्षमता उत्तीर्ण शिक्षकों के पोस्टिंग नीति के खिलाफ आपत्ति उठाई गई है जिसमें निम्नलिखित बिन्दुओं का उल्लेख किया गया है:
1. सक्षमता उत्तीर्ण होने के बाद भी नियोजित बने रहना या विशिष्ट शिक्षक बनना, ये स्वैच्छिक था और सरकार ने इस आशय का शपथपत्र दिया था। अब जबरन उनकी पोस्टिंग की जा रही है।
2. तीन जिलों का विकल्प देना था और परीक्षा उत्तीर्णोपरांत अलॉट किये गये प्रथम जिले में ही पोस्टिंग की जानी थी।
3. अलॉट किये गये प्रथम जिले के लिए भी ऐसा कोई कंडीशन नहीं था कि इस प्रखंड में नहीं, उस प्रखंड में नहीं।
4. स्त्री के लिए कुछ और नियम, पुरुष के लिए कुछ और! क्या सक्षमता प्रथम के नोटिफिकेशन में ऐसा कुछ था?
5. महिला अपने गृह पंचायत/निकाय में व पति (शिक्षक होने पर) के भी गृह पंचायत/निकाय में नौकरी नहीं कर सकती, आखिर इस नियम का क्या संवैधानिक आधार है?
6. सक्षमता उत्तीर्ण कुल 187000 शिक्षक थे और इन्हीं के बीच पदस्थापन की प्रतियोगिता होनी थी। अब पाँच-छः लाख शिक्षकों के साथ सक्षमता उत्तीर्ण शिक्षकों को ट्रांसफर-पोस्टिंग का हिस्सा बनाया जाना कैसे सही? साथ ही भेदभावपूर्ण, किसी के लिए स्वेच्छिक तो किसी के लिए अनिवार्य।
7. सक्षमता नोटिफिकेशन के वक्त तत्कालीन ACS महोदय के अनुसार सबको मेधा के आधार पर देना था शहरी क्षेत्र में पोस्टिंग। किंतु अब रैण्डमाइजेशन की व्यवस्था क्यों जोड़ दी गई? फिर सक्षमता परीक्षा का क्या औचित्य था??
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