शिक्षकों से उनके अभिव्यक्ति की आजादी छीन कर शिक्षा विभाग ने अपने तानाशाही रवैए का एक बार फिर से परिचय दिया है।क्या बिहार में अघोषित तौर पर आपातकाल लागू हो चुका है? क्या किसी अन्य विभाग के कर्मचारियों की तरह शिक्षा विभाग के कर्मचारियों के पास अपनी विचारों को व्यक्त करने का अधिकार नहीं है।इस सरकार ने शिक्षकों को क्या पत्थर की मूर्ति समझ रखा है।क्या उनकी अपनी भावनाएं अपने विचार नहीं हो सकते हैं?अगर ऐसा है तो फिर लोकतंत्र के पर्व से उनको निष्कासित कर दिया जाए।उनसे उनके मतदान का हक भी छीन लिया जाए।एक के बाद एक शिक्षकों को डरा धमका कर विभाग के द्वारा किए जा रहे शोषण के विरुद्ध उठ रहे उनके आवाज को दबाने से यह साबित हो गया की बिहार में लोकतंत्र की हत्या हो चुकी है।
गौरतलब है की इससे पूर्व भी त्रिपुरा हाइकोर्ट का फैसला आ चुका जिसमे यह कहा गया था की सरकारी कर्मचारी भी अपने राजनैतिक विचार सोशल मीडिया या कही और रख सकता है।आखिर वो भी वोट देकर सरकार को चुनता है, सरकारी कर्मचारी के अलावा वो इस देश का एक नागरिक भी है जिसके अपने विचार और राजनीतिक सोच हो सकती है।
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