विभाग के अधिकारियों के मनमाने फैसलों का खमियाजा शिक्षकों को भुगतना पड़ रहा है।शिक्षा व्यवस्था में सुधार
के नाम पर शिक्षकों का अधिकारियों के द्वारा आर्थिक शोषण किया जाता है। टोला सेवक तालिमी मरकज और अन्य कई संविदा पर बहाल जूनियर कर्मियों के द्वारा उनका निरीक्षण करवा कर उन्हें मानसिक तौर पर भी प्रताड़ित किया जाता है।जिस टोला सेवक की बहाली विद्यालय में छात्रों को लाने और ले जाने एवं उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए की गई थी आज वे खुद को किसी पदाधिकारी से कम नहीं समझते हैं। आए दिनों निरीक्षण के नाम पर उनके द्वारा शिक्षक शिक्षिकाओं के साथ दुर्व्यवहार की खबरें आम बात हो चुकी हैं।
विभाग में हर दिन करोड़ों का घोटाले उजागर हो रहे हैं।एमडीएम घोटाला,बेंच डेस्क घोटाला, समरसिब्बल बोरिंग घोटाला, चहारदीवारी तथा भवन निर्माण में धांधली, थाली खरीद में घोटाला, स्पोर्ट्स एवं एफएलएन किट की खरीद में धांधली , प्री फैब स्ट्रक्चर घोटाला, आउटसोर्सिंग से बहाली सहित घोटालों की फेहरिस्त काफी लंबी है जिसमें कमीशनखोरी एवं सरकारी पैसे का बंदरबाट अपने चरम पर है।इन सभी घोटलों पर घिरे विभाग के अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं। यदा कदा जांच के नाम पर थोड़ी बहुत औपचारिकताओं के माध्यम से मामले को रफा दफा कर दिया जाता है।
शिक्षा विभाग के अधिकारी सारे नियम कानून को ताक पर रखकर अपनी मनमर्जी से विद्यालय अवकाश में कटौती करके धार्मिक त्योहार और सामाजिक संवाद के पर पर मिलने वाली छुट्टियां को भी अपने फरमानों से रद्द कर देते हैं। अधिकारी के जिद की वजह से शिक्षकों के साथ तरह-तरह के प्रपंच रचकर तो कभी प्रशिक्षण के नाम पर विद्यालय खुलवाकर शिक्षक की छुट्टियों को रद्द किया जाता है। यहां तक की कृष्णा अवकाश के दौरान भी मिशन दक्ष के नाम पर शिक्षकों को जबरदस्ती सुबह 8 से 10 बजे तक विद्यालय बुलवाया गया। जिसकी वजह से शिक्षकों में काफी असंतोष है। ग्रीष्मावकाश के दौरान विद्यालय संचालन की अवधि में छात्रों की फर्जी उपस्थिति बनाकर एमडीएम के नाम पर प्रधानाध्यापक तथा अधिकारियों की मिलीभगत से विभाग को करोड़ों का चूना लगाया जा रहा है।
महिला शिक्षिकाओं का कहना है कि निरीक्षण के नाम पर फोटोग्राफी के द्वारा उनकी निजता का हनन किया जा रहा है। आए दिनों कई महिला शिक्षकों के द्वारा इन फोटोग्राफ्स में छेड़छाड़ करके सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक तस्वीरें अपलोड करनेसंबंधी शिकायतें भी की जाती हैं। शिक्षकों के साथ किया जा रहे ऐसे अनैतिक व्यवहार विभाग की चुप्पी चिंताजनक है। ऐसे बेटू के आदेशों पर मुख्यमंत्री और महिला आयोग को त्वरित संज्ञान लेकर शिक्षकों के हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए थे। मगर शिक्षा विभाग में व्याप्त तानाशाही की वजह से शिक्षकों की सुध लेने वाला कोई नहीं है।
शिक्षा विभाग के ऐसे तानाशाही रवैए के प्रति शिक्षकों का आक्रोश अपने चरम पर पहुंच चुका है। जो कभी भी उग्र आंदोलन का स्वरूप ले सकता है। साथ ही इसका खामियाजा सरकार को लोकसभा चुनाव के साथ-साथ आगामी विधानसभा चुनाव में भी भुगतना पड़ सकता है।
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