बिहार एक ऐसा राज्य है जहाँ के अलग अलग मौसम में विभिन्न जिलों में रोजाना की भिन्न भिन्न चुनौती चुनौतियां होती हैं। कहीं गर्मी अधिक होती है तो कहीं बाढ़ ग्रस्त इलाके है जहां बरसात में भयावह परिस्थिति हो जाती है। इसी को ध्यान में रखकर पहले हर जिले की छुट्टी अलग अलग होती थी जहाँ गर्मी अधिक वहां गर्मी की छुट्टी जहाँ बाढ़ ग्रसित वहां गर्मी छुट्टी के बदले बाढ़ की छुट्टी मिलती थी । लेकिन एसी के बंद कमरे में रहने वाले एक साहब आये और बिना जमीनी स्तर को जाने सारी व्यवस्था को तहस नहस कर दिये। गर्मी छुट्टी में शिक्षक तो रोज विद्यालय गये लेकिन बच्चो का क्या हाल हुआ कितनी पढ़ाई हुई किसी से छुपा नहीं है। ऊपर से बच्चों की मौत की खबरों और अभिभावकों के आक्रोश के बाद माननीय मुख्यमंत्री को हस्तक्षेप करना पड़ा। उसी तरह बाढ़ की स्थिति वाले जिलों में ऐसा ही कुछ अगले कुछ महीने देखने को मिलेंगे। शिक्षकों की समस्या रही है की बारिश और बढ़ते जल स्तर से कई नदियां उफान पर है जिससे दूर दराज के विद्यालय पहुंचना आसान नहीं है बहुत से लोग ये कहते है की विद्यालय के नजदीक ही गाँव में रहिये लेकिन साहब वहाँ की स्थिति ये रहती है की खुद गाँव वाले जब वहां रहने को तैयार ना हो तो शिक्षकों को ये कहना बेईमानी सी है। वैसे भी बिहार में आज भी कई दूर दराज के इलाकों में नेटवर्क की उपलब्धता न के बराबर है। वहां सुदूर प्रदेश की शिक्षिकाओं का रहना सुरक्षित नहीं है।विद्यालय के बगल मे रूम लेने की सलाह देने वाले लोग क्या अपने बहन बेटीयों को ऐसे इलाके में कुछ दिन के लिए ही अकेले छोड़ सकते है?खैर ये विषय अलग है।इसके अलावा कई लोग यह भी कहते दिख जाएंगे की इतनी दिक्कत है तो फिर नौकरी छोड़ दो।उनको यह समझना चाहिए की सामान्यतः दो तरह के लोग शिक्षक बनते है एक जिनका पैशन हो और दूसरे जिनको रोजगार चाहिए दोनो परिस्थितियों में शिक्षकों का मकसद बच्चों को पढ़ाना ही है।रोजगार पढ़े लिखे युवाओं की प्राथमिकता है।अब शिक्षक का पेशा भी ऐसा ही बना दिया गया है जहां प्रतियोगिता का स्तर इतना हो चुका है की एक अदद नौकरी के लिए कई स्तर की परीक्षाओं को पास करने के बाद भी नौकरी की कोई गारंटी नहीं है। इसके बावजूद भी शिक्षकों पर ऊँगली उठाने वाले लोग ये जबाब दे...
1. सरकार जबरदस्ती शिक्षकों की योग्यता जांचने के लिए सक्षमता परीक्षा ली लेकिन आज 6 महीने बाद भी परीक्षा पास करने के बाद शिक्षक पदस्थापना के इंतजार मे क्यों बैठे है ?
2.पिछले 20 साल से नियोजित शिक्षकों को ट्रांसफर क्यों नहीं दिया गया ?
3. क्या मनमाने तरीके से सारे नियम कायदों को ताख पर रखकर शिक्षकों की छुट्टी रद्द कर देने से शिक्षण व्यवस्था सुधर जाएगी ?
4. सुदूर ग्रामीण इलाके जहाँ आज भी बिजली/नेटवर्क/परिवहन की व्यवस्था नहीं है या बाढ़ग्रस्त इलाकों में अपने बहन बेटियों को विद्यालय के बगल मे रूम लेकर रहने को कहेंगे ।
5. यह सही है की शिक्षक की ड्यूटी है तो उन्हें बाढ़ तूफ़ान मे भी जाना जरूरी है लेकिन क्या बिना मूलभूत सुविधाओं के ये सम्भव है ?
6. विद्यालयों मे पिछले कई महीनों से लूट खसोट का दौर चला। कितने लोगों ने आवाज़ उठाने की जरूरत समझी इन भ्रष्ट अधिकारियों के विरूद्ध ?
7. क्या प्राकृतिक आपदा मे सिर्फ शिक्षक को विद्यालय पहुंचा देने से बच्चो को शिक्षा मिल जाएगी?
आप कुतर्क अवश्य कर सकते है लेकिन इन सवालों का जबाब नहीं दे सकते। सवाल बहुत है अगर आप शिक्षकों की समस्याए हल कर दे तो उपरोक्त समस्या खुद हल हो जायेगी। फिर कभी आपको शिक्षक अपनी समस्या बताते नहीं दिखेंगे। जमीनी स्तर पर उतर कर जिस दिन शिक्षकों की,विद्यालयों की और बच्चो की समस्या सुन कर उसका निदान कर दिया जायेगा उस दिन तमाम समस्यायें हल हो जाएगी और विद्यालय 220 दिन से भी ज्यादा साल मे स्वतः खुल जाएंगे ।
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