जुल्म के साए में लब खोलेगा कौन,
आप और हम भी चुप रहे तो फिर बोलेगा कौन?
जैसा कि मैंने अपने पिछले कई पोस्ट में यह अनुमान व्यक्त किया था कि यदि समय रहते के के पाठक एवं शिक्षा विभाग के अधिकारियों पर आवश्यक लगाम नहीं लगाया गया तो शिक्षकों पर इनका अत्याचार बढ़ता ही चला जाएगा।अब ग्रीष्मावकाश के दौरान शिक्षकों के साथ की जा रही दबंगई में एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। अब तक विद्यालय निरीक्षण के नाम पर अधिकारियों द्वारा की जा रही अवैध वसूली एवं समय पूर्व चेकिंग करके वेतन कटौती का भय दिखाकर शिक्षकों को मानसिक व आर्थिक रूप से प्रताड़ित करना तो आम बात हो चुकी है। अब उनके सर्विस बुक पर इस तरह के कार्रवाई को दर्ज करके अधिकारियों को शिक्षकों के आर्थिक दोहन का नया लाइसेंस प्रदान किया गया है। अगर अभी भी शिक्षक समुदाय एकजुट होकर इस शोषण के विरुद्ध आवाज नहीं उठाता है तो वह समय अब दूर नहीं जब शिक्षकों की स्थिति बंधुआ मजदूरों से भी बदतर हो जायेगी।
शिक्षा विभाग शिक्षकों के संवैधानिक और मौलिक अधिकारों की बली तो कब की चढ़ा चुका है। उनके साथ किये जा रहे अमानवीय व्यवहार की सारी हदें पार की जा चुकी हैं। यहां तक की मुख्यमंत्री के द्वारा सदन में दिए गए बयान को दरकिनार करते हुए आज तक विभाग के अधिकारी अपने मनमाने आदेशों के द्वारा शिक्षकों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का कोई भी अवसर नहीं चूक रहे हैं। न्यायालय के आदेशों की धज्जियां उड़ाना तो विभाग के अधिकारियों का शौक बन चुका है।उच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद आज भी खुलेआम शिक्षा सेवकों एवम तालिमी मरकज के द्वारा विद्यालयों का निरीक्षण कार्य यथावत चल रहा है। विभाग के अधिकारी न्यायालय के आदेशों को अवहेलना करने के लिए दाव पेच के हथकंडे अपनाने से भी बाज नहीं आ रहे। न्यायालय की अवमनना से बचने के लिए विभाग के अधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान मौखिक आदेशों का सहारा ले रहे हैं ताकि शिक्षक अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों एवं अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय की शरण में भी ना जा सके।
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