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Friday, May 17, 2024

बिहार शिक्षा विभाग में अधिकारियों की मनमानी आखिर कब थमेगा शिक्षकों का शोषण?

दिल में खौफ, दिमाग में तनाव...ये तस्वीरें अपने आप में बहुत कुछ बयान करती है।ये विभाग और अधिकारियों की कारिस्तानी ही है जो शिक्षक जैसा पेशा हो या मासूम नौनिहाल सभी त्रस्त हो चुके हैं।और वो भी सरकार से लेकर न्यायालय तक को ठेंगा दिखा चुके एक सिरफिरे अधिकारी की बदौलत।क्या वास्तव में लोकतंत्र की जननी कही जाने वाली बिहार की इस गौरवशाली भूमि में लोकतंत्र जैसा कुछ भी शेष बचा है। जहां राष्ट्र के भविष्य सवारने वाले शिक्षकों को अपनी अधिकारों के प्रति आवाज उठाने तक की आजादी न हो। अभिव्यक्ति की आजादी जैसे मौलिक अधिकार को अपने कदमों तले रौंदने वाले ऐसे तानाशाही मानसिकता को सरकार द्वारा मौन समर्थन दिया जाना क्या लोकतंत्र की हत्या नही है।
         क्या इस माहौल में शिक्षकों के लिए शैक्षणिक कार्य करना संभव है? आप खुद सोचें! सोशल मीडिया पर कुछ लोग के के पाठक द्वारा उठाए गए इन कदमों की सराहना भी कर रहे हैं। कुछ तो बिहार के सरकारी विद्यालयों की तुलना प्राइवेट स्कूलों से करने तक की बात करते हुए शिक्षकों को ताने भी दे रहे हैं। उनकी नजर में बिहार के सरकारी शिक्षक वास्तव में एक विलन सरीखे हो चुके हैं और उनके साथ हो रहा यह अन्याय उन्हें जायज भी लगता है।किंतु उन्हें यह अवश्य सोचना चाहिए की के के पाठक द्वारा उठाए गए इन कदमों की जमीनी हकीकत क्या है?सरकारी विद्यालयों से प्राइवेट स्कूलों की तुलना करने वाले ये लोग इन विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों की वास्तविक परिस्थितियों से अनजान है। प्राइवेट स्कूलों के बच्चों के अभिभावक सामर्थ्यवान होते है। ऐसे विद्यालय अधिकतर शहरी क्षेत्रों में होते हैं जहां अच्छी सड़कों के साथ स्कूल बस जैसी परिवहन की मूलभूत सुविधाएं होती हैं। दूर दराज के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित सरकारी विद्यालयों की स्थिति इसके विपरीत होती है। यहां समाज के अपेक्षाकृत वंचित वर्गों के बच्चे शिक्षा ग्रहण करने आते हैं जिनके अभिभावक इतने सक्षम नहीं वे प्रतिदिन सुबह-सुबह अपने सारे कामकाज(कृषि, मजदूरी इत्यादि) छोड़कर बच्चों के लिए खाना व नाश्ते की व्यवस्था कर सकें।न ही वह इतने सक्षम है की बच्चों के विद्यालय पहुंचने की व्यवस्था कर सके। ऐसे में बच्चों को जबरदस्ती तपती दोपहरी में विद्यालय में रोककर रखना उनके जीवन के साथ खिलवाड़ करना है।
बिहार के शिक्षा विभाग के द्वारा शिक्षक में सुधार के नाम पर उठाए गए इन कदमों से वास्तव में शिक्षा व्यवस्था को काफी क्षति पहुंच रही है।अधिकारियों की मनमानी बढ़ने की वजह से भ्रष्टाचार के मामलों में काफी बढ़ोतरी तो हुई ही है।बिहार के आम टैक्स पेयर्स के पैसों का दुरुपयोग भी काफी बढ़ा है। शिक्षक चुपचाप अधिकारियों के अत्याचारों को सहने हेतु विवश तो हैं ही। कार्रवाई के डर से वे भ्रष्टाचार के इन मामलों को मूकदर्शक बनकर देखने तक को मजबूर हो चुके हैं। यदि कोई शिक्षक आवाज उठाने की कोशिश करता भी है तो उसकी आवाज को तत्काल अधिकारियों के द्वारा करवाई का भय दिखाकर दबा दिया जाता है।अभिव्यक्ति की आजादी को शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने अपने कदमों तले रौंद रखा है। इसके लिए वे तरह-तरह के हथकंडे अपनाने से भी नहीं चूकते हैं। उनके शोषण का आलम यह है कि सरकारी विद्यालयों के छुट्टियों को भी अनधिकृत तरीके से रद्द किया जा रहा है। रोज नए नए फरमानों के द्वारा शिक्षकों को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है।ताकि शिक्षकों का सारा फोकस छुट्टियों और स्कूल टाइमिंग के बहाने हो रहे अवैध वसूली पर लगा रहे और और विभाग में चल रहे भ्रष्टाचार पर किसी की नजर ना पड़े। अखबारों में भी गाहे बेगहे विभाग के तुगलक की फरमान ही सुर्खियों में बने रहते हैं। इस वजह से शिक्षा विभाग में चल रहे भ्रष्टाचार के नए मामले उजागर नहीं हो पा रहे हैं। सरकार भी आश्चर्यजनक रूप से विभाग के इन मनमाने कदमों को अपनी मौन सहमति प्रदान कर चुकी है।जो की काफी समय से चर्चा का विषय बना हुआ है।

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