इस लिंक में दिए गए वीडियो को जरा गौर से सुनिए और विमर्श कीजिए। क्या हमारे राज्य के नौनिहालों का भविष्य गढ़ने वाले शिक्षा विभाग की बागडोर सही हाथों में है? क्या सिर्फ राजनीतिक षड्यंत्र के तहत शिक्षकों को टारगेट करके सुर्खियां बटोरने वाले ऐसे सिरफिरे अधिकारियों के हाथों में बिहार के बच्चों का भविष्य सुरक्षित है? जिनके तुगलकी फरमानों की वजह से समूची शिक्षा व्यवस्था का बंटाधार होते हुए हम सिर्फ मौन रहकर तमाशा देखने को मजबूर हैं।इस तमाशे की आड़ में शिक्षा विभाग में न जाने कितने ही घोटाले चल रहे हैं। बेंच डेस्क, थाली खरीद, भवन निर्माण, समरसिबल बोरिंग से लेकर न जाने कितने ही घोटाले के स्वर इस कोलाहल के आगे दब चुके है।
बिहार में वसूली के लिए कुख्यात (मद्य निषेध) विभाग से उठा कर के के पाठक जैसे जिद्दी और घमंडी अधिकारी को बिहार में शिक्षा विभाग का ACS बना दिया गया। जिसके ऊपर ज्वाइनिंग के साथ ही अपने मनमाने आदेशों से समूची शिक्षा व्यवस्था में उथल पुथल मचाकर बस खबरों में बने रहने का भूत सवार है।जो सिर्फ नियम कानूनों को तोड़ मरोड़ कर एवं सविधान को ताक पर रखकर अपनी जिद के आगे मुख्यमंत्री के आदेश तक की अवहेलना करने से बाज नहीं आता।आज इन सबके दुष्परिणाम हमारे सामने हैं।
साथ ही साथ विभाग के मंत्री का दायित्व भी पुलिस बैकग्राउंड से आने वाले एक रिटायर्ड अधिकारी से नेता बने अदूरदर्शी और अनुभवहीन व्यक्ति के हाथ में सौंप दी गई। जो अपने पूर्ववर्ती से भी दो कदम आगे निकलते हुए बस पाठक की जी हुजूरी में लगा रहे।इस जोड़ी ने मिलकर बिहार की शिक्षा व्यवस्था को रसातल में पहुंचा दिया है।

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