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Thursday, October 10, 2024

"रतन टाटा: वह महानायक जिनके निधन से शोकमग्न हो उठा पूरा विश्व, प्रधानमंत्री मोदी से लेकर कई वैश्विक हस्तियों ने दी अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि। जानें उनकी प्रेरणादायक जीवन यात्रा"

रतन टाटा: एक प्रेरणादायक यात्रा


एक बार की बात है, मुंबई की भारी बारिश के बीच एक पति-पत्नी को स्कूटर पर अपने दो बच्चों सहित बरसात के थपेड़े खाते हुए सड़क पर हिचकोले खाते देख, रतन टाटा का मन द्रवित हो गया। कौन ध्यान देता है मध्यम वर्ग की मुश्किलों पर? लेकिन रतन टाटा ने उसी क्षण मध्यम वर्ग की "बजट कार" का संकल्प लिया और देखते ही देखते वो कारनामा कर दिखाया जिसका सपना भी बड़ा से बड़ा उद्योगपति नहीं देख सकता था। उन्होंने टाटा नैनो बनाकर बाजार में उतार दी। उन्होंने वादा किया था कि कार की कीमत एक लाख रुपये रखेंगे और उन्होंने यह वादा बखूबी निभाया। शुरुआती नैनो का एक्स-फैक्ट्री मूल्य एक लाख ही रखा गया जिसका डॉलर में मूल्य उस समय ढाई हजार डॉलर होता था। जापान की सुजुकी कंपनी ने हाथ खड़े कर दिए कि वे ढाई हजार डॉलर में कार नहीं बना सकते।

नैनो एक अद्भुत कार थी, लेकिन भारतीयों के लिए कार एक स्टेटस सिम्बल होती है। वे कार भी खरीदें फिर भी गरीब माने जाएं, यह उन्हें बर्दाश्त नहीं हुआ। नैनो खरीदने वाले पिताओं को उनके बच्चों ने भी हीन दृष्टि से देखना शुरू कर दिया, लिहाजा नैनो फ्लॉप हो गई। मगर रतन टाटा का विजन सुपरहिट था और उनका वादा बिल्कुल पक्का।


कहते हैं कि रतन टाटा ने युवावस्था में अपनी पढ़ाई के दौरान एक लड़की से वादा किया था कि शादी करेंगे तो उसी से करेंगे वरना नहीं करेंगे। परंतु बीच में वे अपनी बूढ़ी दादी की बीमारी के कारण भारत चले आए। माता-पिता का तलाक हो जाने के कारण दादी ने ही उनको पाला-पोसा था। रतन को अमेरिका लौटने में देर हो गई और लड़की के माता-पिता ने उसकी शादी दूसरी जगह कर दी। मगर अपना किया वादा निभाते हुए रतन टाटा ने फिर आजीवन शादी नहीं की।

After all, Promise is a Promise.


टाटा ग्रुप अपनी आमदनी का लगभग 65% जनहित में खर्च करता है। टाटा समूह की अधिकांश या यूं कहें तो समस्त कंपनियों की मालिक टाटा सन्स है। लेकिन टाटा सन्स भी सिर्फ कंपनियों के कामकाज को देखता है। उस टाटा सन्स में लगभग 66 प्रतिशत शेयर टाटा के अलग-अलग ट्रस्ट के पास हैं। वास्तव में ये जो ट्रस्ट हैं, वहीं टाटा के असली मालिक हैं। टाटा समूह जो कुछ लाभ कमाता है, उसका दो तिहाई हिस्सा अंततः इन्हीं ट्रस्ट के पास चला जाता है और ट्रस्ट वह पैसा स्वास्थ, शिक्षा, स्वच्छता, आपदा राहत, खेल, कला संस्कृति, सामाजिक समरसता, जीवनयापन, स्किल डेवलपमेंट, डिजिटल एजुकेशन और सामाजिक संस्थानों पर खर्च करता है।

व्यापार बिल्कुल पेशेवर तरीके से होता है, लेकिन उस व्यापार से जो लाभ प्राप्त होता है, उसका दो तिहाई हिस्सा समाज की सेवा में खर्च कर दिया जाता है। जो एक तिहाई बचता है, उसी में टाटा परिवार के सदस्यों का हिस्सा होता है और सबसे बड़ा शेयरधारक "शपूरजी पलोनजी एंड कंपनी" है जिसके निदेशक स्वर्गीय साइरस मिस्त्री कुछ समय के लिए टाटा के चेयरमैन भी बने थे।

हालांकि साइरस के निर्णय अत्यधिक लाभ की मानसिकता से ग्रस्त थे और वो टाटा समूह के मूल उद्देश्य से उसे भटकाने की कोशिश कर रहे थे, जो रतन टाटा को पसंद नहीं आया। उस समय रतन टाटा ने व्यक्तिगत रूप से पहल करके साइरस को टाटा समूह से बाहर का रास्ता दिखाया और स्वयं टाटा सन्स के दोबारा चेयरमैन बन गए।

मगर रतन टाटा का खुद का शेयर कितना था? मात्र 0.8 प्रतिशत। अब वह शेयर भी टाटा ट्रस्ट के पास चला जाएगा क्योंकि रतन टाटा अविवाहित थे।

व्यापार का ऐसा उच्च आदर्श मात्र टाटा समूह में ही दिखता है जिनके व्यापार के मूल में लोगों का हित होता है, फिर वो कंपनी के कर्मचारी हों या समाज के सामान्य लोग। टाटा समूह का चेयरमैन कभी अरबपतियों-खरबपतियों की रेस में शामिल नहीं होता। वहां लाभ निजी खाते में जाने की बजाय समाज को वापस किया जा रहा है।

रतन टाटा ने टाटा समूह के उन्हीं मूल्यों को पूरी तरह निभाया, जिनको जमशेदजी टाटा और सर रतन टाटा जैसे उच्च आदर्शों वाले व्यापारियों ने स्थापित किया था। रतन टाटा ने एक और साहसिक निर्णय लेते हुए पहली बार टाटा सन्स के चेयरमैन पद के लिए किसी गैर पारसी का चयन किया। एन चंद्रशेखरन को चेयरमैन बनाकर उन्होंने टाटा समूह से जुड़ा एक बड़ा मिथक तोड़ दिया।

निश्चय ही रतन टाटा जैसे व्यापारी और टाटा समूह जैसे व्यावसायिक घराने लोक समाज के सर्वोच्च सम्मान के अधिकारी हैं।


रतन टाटा को अश्रुपूर्ण विनम्र श्रद्धांजलि।

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